गुरुपूर्णिमा और भारतीय संस्कृति

img_20200218_170437गुरु पूर्णिमा का त्यौहार हमारे देश में प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। कहा जाता है इसी दिन आदियोगी भगवान शिव ने सप्तर्षियों को ज्ञान प्रदान किया था। महर्षि वेदव्यास जिन्होंने महाभारत अठारह पुराणों और वेदों की टीका लिखी थी ,उन के जन्म दिवस के रुप में जाता है । कहा जाता है भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को सारनाथ में इसी उपदेश दिया था । इस तरह से यह त्यौहार हिंदू और जैन सभी लोग समान रूप से मनाते हैं ।
प्राचीन समय में जब गुरुकुल की शिक्षा पद्धति चलती थी तो उस समय गुरुकुलों में छात्रों का नामांकन गुरु की वंदना के आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को ही प्रारंभ होता था। समय मौसमानुकूल विद्याध्ययन के लिये अनुकूल भी रहता था। उस समय चतुर्वेदी ऋषियों के आश्रमों में राजाओं के पुत्र भी चतुर्दश -विद्या और चौंसठ कलाओं को सीखने के लिए उनके आश्रमों में मैं भिक्षुओं के समान रहते थे और भिक्षाटन से ही गुरु और शिष्य का भरण पोषण होता था।तब उस समय गुरु और शिष्य का सम्बंध बहुत ही गहरा अटूट हुआ करता था। गुरु की हर आज्ञा का पालन करना शिष्य अपना परम कर्त्तव्य समझता था।आरुणि और कर्ण जैसे शिष्यों ने आज्ञापालन की परंपरा को आदर्श रूप दिया।
भारतीय शिक्षा परम्परा में गुरु के बारे में अगाध श्रद्धा का सागर लोगों के मन में बहता था तभी तो कबीर दास ने कहा –
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ।।

वास्तव में जीवन के किसी मार्ग या क्षण में जब व्यक्ति को कोई रास्ता नहीं सूझता तो गुरु ही सच्चे पथ प्रदर्शक का काम करता है । गुरु ही सही रास्ते पर शिष्य को ले जाता है चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या कोई अन्य। हर क्षेत्र में किसी गुरु या उस्ताद की जरूरत पड़ती है । वह गुरु ही है जो हमें जीवन के कंटक पथ पर निर्बाध गति से चलने की प्रेरणा देता है, हमारे डगमगाते क़दमों को थाम लेता है। सद्गुरु हमारे मन को पढ़ लेता है और हर आशंकाओं और भय को चुटकियों में दूर कर देता है जिसे आधुनिक शिक्षा पद्धति में डाउट क्लियर करना बताया गया है।
भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान मैकाले की शिक्षा पद्धति में प्रादुर्भाव के फलस्वरूप गुरु के स्थान को थोड़ा गौण बनाने की कोशिश जरूर की गई परंतु भारतीय संस्कृति की अक्षुण्ण प्रकृति के कारण गुरु का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है, हां उसकी बाहरी संरचना में आधुनिकता का समावेश जरूर हुआ है जो बदलते परिवेश में अवश्यम्भावी है।
इस बार की अषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा रविवार यानी 5 जुलाई को है ,साथ ही चंद्रग्रहण का भी योग है। कोरोनजनित महामारी की चपेट में आज हमारी शिक्षा व रोजगार दोनों है अतः इस आपातकाल में हमे सही रास्ता दिखाने का काम कोई गुरु ही कर सकता है।

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