मोती आव आव :एक संस्मरण

                      भाग -एक

मेरे गांव के पड़ोस में चल रही रासलीला समाप्त होने को थी तभी लाउडस्पीकर पर ‘मोती आव आव ‘की आवाज गूंजने लगी . सभी लोग आश्चर्यचकित थे. दरअसल यह उदघोषणा मोती नाम के उस श्वान के लिए की जा रही थी जो आया तो था मेरे बड़े चाचा जी के साथ लेकिन भीड़ में कहीं गायब हो गया था ।
उस समय गांव में वृंदावन की रासलीला का बहुत आकर्षण हुआ करता था महिलाये, बड़े, बुजुर्ग व बच्चे बड़ी संख्या में भगवान कृष्ण की लीलाओं को देखने और गोपियों की मीठी बोली सुनने के लिए आया करते थे। बच्चों को तो कृष्ण का मयूर नृत्य कुछ ज्यादा ही भाता था ।
इस बार रासलीला-स्थल दूर था रास्ता भी कुुुछ दुर्गम था अतः बच्चों के जाने पर रात्रि में प्रतिबंध लगा दिया गया था । पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं, हमारी शैतान मंडली भी छुपते छुपाते रासलीला का आनंद उठानें पहुंच चुकी थी । तय हुआ था कि ज्यादा लालच नहीं करना है ,रासलीला समाप्त होने से पहले ही धीरे से खिसक लेना हैं। हम ज्यों ही चले मोती भी हमारे साथ हो लिया और इस तरह हम अपने प्लान के मुताबिक मोती की अगुवाई में घर पहुंच चुके थे ।इधर काफी प्रयास के बाद भी जब मोती का कुछ पता नहीं चला तो बड़े चाचा उदास मन लिये घर लौट के आ गये। लेकिन उसके भौकने की आवाज़ सुनकर उनको अंदाजा लग गया कि मोती बोर हो के अकेले ही भाग चला होगा । हालांकि, उसे इस गलती की सजा दो डंडो की पिटाई के रूप में मिली। बहुत दिनों बाद ये राज खुल ही गया कि मोती की मोती अकेले घर नहीं पहुँचा था।
मोती था तो एक श्वान ही पर मेरे संयुक्त परिवार में उसे उतना ही प्यार और सम्मान प्राप्त था जितना बाकी सदस्यों को । दादी ने मुझे बताया था कि जब मेरा जन्म हुआ उसी समय पिता जी उसे अपने कोट की थैली में रख के लाये थे। वह मेरा समकालीन, शागिर्द और सहचर था। मेरी मां उसके मेरे बीच प्रतियोगिता रखती और बोलती की देखें कौन अपना दूध पहले समाप्त करता है। मैं उसे देख के दूध जल्दी पीने की कोशिश करता पर वह अक्सर जीत जाता क्योंकी कटोरी में रखे दूध को उसे अपनी जिह्वा से चप चप चाटते देख बड़ा मजा आता था। जब कभी अपने गिलास के दूध को उसकी तरह पीने की कोशिश करता अपनी जीभ को जला लेता। अक्सर उसकी गलतियों के लिए सम्मिलित रूप से डांट हमे ही मिलती तो लगता कि मनुष्य योनि में जन्म लेना ही अपराध है।      मजेदार बात यह है कि स्तनधारियों में सबसे देर से स्वावलंबी होने वाला मानव ही है। हम भले ही सभी जीवों से उन्नत होने का दम्भ भर लें पर हमारा शारीरिक विकास व सीखने की क्षमता कच्छप गति से चलती है। शायद यह संयोग ही कहा जायेगा कि दोनों का जीवन- काल लंबा मिला है। बचपन शायद इन सभी तर्कों और चिंता से दूर होता है, वो तो किताब ए गम में खुशी का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेता है।
फिलहाल उपरोक्त बातों का मोती को कोई ज्ञान था न हमे कोई कोई मतलब। मोती तो बस हमारा एक अच्छा सा, प्यारा सा दोस्त था। उसका नाम मोती किसने रखा ? कब रखा ये तो आज भी नही पता पर हाँ, उसकी सुनहली रंगत में मोती से चमकते दांत चार चांद जरूर लगा देते थे। उसके मोती से चमकते दांतो का राज एक दिन तब खुला जब हम नित्य क्रिया से निवृत हो दातुन इस अपने दांत साफ कर रहे थे। तभी मेरी नज़र मोती पर पड़ी तो देखा तो वह घास को तोड़ के खा रहा था । फिर थोड़ी देर बात उसने कफ के साथ उगल दिया। उस दिन पहली बार समझ में आया कि वह तो धौति-क्रिया कर रहा था । शायद प्रकृति नें उसे मुख शुद्धी का यही तरीका सुझाया हो।

                  भाग – दो

मोती को कभी जंजीरों में बांधकर नहीं रखा गया वह स्वानुशासन से भलीभांति परिचित था।कभी उसने कोई अनाधिकार चेष्टा नही की।

वह दूसरों की सीमाओं का सम्मान करता था परन्तु अपनी सीमा को भी सुरक्षित रखना बखूबी जानता था । कई बार हम बच्चों ने उसे अपने घर के आंगन में ला कर  छोड़ा भी पर हर बार वह बाहर ही भाग खड़ा होता था । हमने  उसे कभी भी घर की चौखट लांघते नहीं देखा।शायद अनुशासन और अच्छी आदते का प्रभाव मानव व जानवरों के बच्चों पर सामान रूप पड़ता होगा| मोती भी इसका अपवाद नहीं था।हमारा परिवार एक कुलीन ब्राह्मण परिवार था ,मेरे दादा जी स्कूल में हेड मास्टर थे और बेहद अनुशासन प्रिय थे । अतः मोती सहित हम सभी बच्चों को अनावश्यक किसी के घर जाने पर पाबंदी थी ।मोती को भी अपनी हदों और चौहदो का अच्छी तरह ज्ञान था | लेकिन अपमान होने पर वह रूठ जाता तो उसकी मिन्नते भी करनी पड़ती थी ,उसे भोजन देना ही पर्याप्त नहीं था उसे पुचकारना भी जरुरी था वरना उसे सूंघकर छोड़ भी देता था ।

जब भी स्कूल की लंबी छुट्टियां पड़ती, दादा दादी का दुलार और मोती का प्यार हमें अपनी ओर बरबस खींचने लगता । थोड़ी न नुकुर के बाद अंततः पिताजी हमें गांव भेजने को राजी हो जाते फिर तो हमारी शैतानियों को जैसे पर लग जाते । हमारे गांव आने पर सबसे खुश तो मोती ही दिखता। हमारे घर पहुँचने पर सबसे पहले मोती ही हमारी अगवानी करता।अपनी चमकीली आँखों से और अनथक दोलन करती अपनी छोटी सी दुम से वह अपनी अपार खुशी को जाहिर करता । फिर हमारे चारों ओर गोल चक्कर लगाता और झुक के ऐसे देखता जैसे पूछ रहा हो कि इतने दिन कहाँ चले गये थे? हम दोनों भाई उसकी बातों को बखूबी समझते थे कि उसने भी हमें काफी मिस किया होगा । बदले में हम उसे पुचकारते-दुलारते उसे बिस्कुट या मिठाई खाने को देते। फिर वो अपनी छोटी सी दुम को दोलनवस्था में रख चटखारे ले ले कर खाने लगता।
जबतक हम दादा जी व अन्य को प्रणाम पाती करते तब तक वह खेलने का जुगाड़ तैयार कर लेता । कुछ नहीं तो कपड़े का कोई टुकड़ा या प्लास्टिक की पन्नी जो भी उसके समझ मे आता मुंह मे दबा के आता और हमे उसे खींचने का निमंत्रण देता । हम बच्चों को भी इस निमंत्रण से एतराज कब होता ? इस तरह शुरू हो जाता हमारा पकड़ो छोड़ो और लुका- छिपी का खेल। फिर कभी हम उसके पास जाकर भोपू बजाते तो वो भी अपने मूड में आ जाता और हमारे चारों ओर गोल गोल चक्कर लगाता फिर रुकता । भागम -भाग का खेल इतना मजेदार होता था कि हमारे छोटे चाचा भी इसमें शामिल हो जाते, बाकी लोग भी मोती की इस लीला का आनंद लेते।

                भाग – तीन
उस समय गांव में खेती के तौर तरीके उतने विकसित नही थे, खेती में अधिकतर हल और बैल के सहारे ही होती थी। मुझे याद है कि खेतों में पराली जलाने के कोई रिवाज नहीं था । खलिहान पूरी तरह से कभी खाली नहीं रखे जाते थे। धान की फसल कटने पर पुआल को जमा करके रखा जाता था जो पशुओं के चारे या जलावन के भी काम आती थी क्योंकि रसोई गैस का नामोनिशान भी नहीं था। फिलहाल ये पुआल के ढेर हमारी शैतानियों के हॉट स्पॉट हुआ करते थे। शैतान मंडली अपने कई खेलों जैसे गुलाटी मारना, लुक-छिपी या घरौंदे बनाने के काम को यहीं अंजाम देती थी। मोती का भी इन कारनामों में अहम रोल होता।ये बात अलग है कि दादा जी को जब ये मालूम होता तो फिर सभी भाग खड़े होते, फिर दादा जी ले जासूस पता लगाना शुरू करते तो हम सभी कहीं छुप जाते, मोती भी दादा जी की चापलूसी में उनके आगे पीछे दुम हिलाता नजर आता। बाद में जब बिना स्नान किये घर में नहीं घुसने का फरमान सुनाया जाता तो हमारी घिघ्घी बंध जाती। उस समय किसी तरह करूणा की मूर्ति बनी दादी बहुत काम आती और शाम के धुँधलके में घर में खिड़की के रास्ते हमारा गृह प्रवेश हो पाता तबतक दादाजी के गुस्से का ग्राफ भी काफी नीचे आ गया होता। उस समय ये बातें हमारे लिये बस एक तात्कालिक चेतावनी बस थी जिसको हम कभी गंभीरता से नही लेते थे और उनके स्वभाव का एक अहम हिस्सा मानकर अपने अगले प्रोजेक्ट में लग जाते थे। उन सनातन नियमों की उपयोगिता और वैज्ञानिकता का ज्ञान हमें काफी बड़े होनें पर पता चल पाया।

जब कभी हम खेतों में जाते तो मोती हमारा प्रहरी बन कर चलता हालांकि बीच में सूँघकर जरूर पता कर लेता कि कहीं कोई खतरा तो नहीं । गांव के खेत और उसमें काम करने वाले कृषक दोनों उर्वरा शक्ति से भरपूर थे! गांव में सब्जियों के अलावे सभी तरह के मोटे अनाज बोये जाते थे, उनमें स्वाद भले कम हो पर विटामिन और उर्जा से परिपूर्ण थे क्योंकि उनमें गोबर जैसे जैव उर्वरकों का ही प्रयोग होता था। सनई- मकई के फूल और मस्ती में झूमती ज्वार-बाजरे की बालियां किसी को भी मस्ती से भर देती थी।
उस वक्त गांव में सिंचाई के लिए पंप सेट का चलन बहुत कम था, अक्सर छोटे खेतों के लिए ढेकुल जो आजकल चेक पोस्ट पर लगे बैरियर की तरह होती थी, के द्वारा कुँए से पानी निकालकर कच्ची नालियों से खेतों में पहुँचाया जाता था। यह तरीका श्रम साध्य जरुर था लेकिन पर्यावरण के प्रतिकूल नहीं था जिसमे तेजी से भूगर्भीय जल का दोहन नही हो पाता था । बहरहाल हम बच्चों और मोती को इसके पीछे के विज्ञान से कोई मतलब नहीं था। हमें तो वक्राकार नालियों से कलकल कर खेतों तक बहता पानी और मिट्टी से आती सोंधी सी महक मस्ती से भर दिया करती थी। मोती भी अपने शिकार की तलाश में रहता कि कब कोई चूहा या अन्य जीव पानी से बाहर आये और उसका शिकार बने।
जब मक्के के खेतों में लाल भूरे बालों से युक्त बालियां आ जाती तो बच्चों के साथ साथ सियारों मन भी ललच उठता। किताबों में धूर्त सियारों की कहानियों हमने बहुत पढ़ी थी तो उनसे साक्षात्कार मौका भी हम क्यों जाने देते ? तो ये मौका हमें बड़े आराम से मिल जाता क्योंकि खेत मे बने बांस के मचान पर शिफ्ट के अनुसार हमारी ड्यूटी भी ड्यूटी लगा दी जाती थी । हालांकि सियारों से हमारा सामना कम ही हो पाता , मोती जब तक वहाँ पर रहता किसी भी सियार या किसी अन्य जानवर की हिम्मत नहीं पड़ती की पास भी फटक जाए।

तब गांव आज की तरह विकसित नहीं थे विकास की रोशनी शहरों तक ही सीमित थी। ढिबरी या मिट्टी तेल के लालटेन से रात के अंधेरे को दूर करने का प्रयास किया जाता था । चुकी तेल भी ज्यादा नहीं होता था इसलिए राते लंबी हुआ करती थी ,विशेषकर जड़ों की रातें । लोगबाग जल्दी भोजन ग्रहण करते और जल्दी सो जाते लेकिन सुबह जल्दी उठते। मेरे परिवार के लोग थोड़े पढ़े लिखे थे और बाहरी दुनिया से मतलब रखते थे इसलिए रेडियो जो एकमात्र संचार का साधन था पर खबरें सुना करते थे ।बीबीसी के समाचारों को कभी कभी हम भी सुना करते लेकिन आडियो सिग्नल ऐसे थे कि आधी बाते ही सुन पाते और आधी बातें दब जाती। जहां तक हम बच्चों की बात थी ,हमें तो बिना कथा-कहानी के नींद ही नहीं आती थी। दादी और बुढ़िया दादी के पास कहानियों का एक समृद्ध भंडार था ।
इस बीच मोती की ड्यूटी बढ़ जाती थी, वह जरा भी आहट होने पर जाग जाता और तब तक भौंकना जारी रखता जब तक उसे इत्मीनान नहीं हो जाता कि अब कोई खतरा नहीं है । उस समय गाँवों में चोरों का भी आतंक बहुत था। आये दिन चोरी और सेंधमारी के किस्से सुनने को मिल जाते 

                 भाग – चार
घर के सामने एक विशालकाय पीपल का वृक्ष और उससे सटा ब्रह्म बाबा का मंदिर, यही पहचान थी मेरे घर की। वह सदाबहार रहता था और उसकी शाखायें हमेशा तरह तरह के पक्षियों से गुंजायमान रहती थी। इनमें से कुछ तो प्रवासी थे जो जो वर्ष के कुछ दिन यहाँ बिताते ,और फिर अपने देश लौट जाते। लेकिन बकुले सरीखे कुछ पंक्षियों का यहाँ स्थाई निवास था। हमें उनके घोसले बनाते देख बहुत मजा आता । वे जगह जगह से तिनके अपने चोंच में दबा कर लाते और एक एक कर उन्हें बड़े सलीके से ठीक उसी तरह रखते औऱ बुनते जैसे गाँव मे लोग फूस की झोपड़ियो को बनाते । हम अक्सर आदमी और पक्षियों के इस कार्य की तुलना करते। कभी कभी हम स्वयं भी इस शिल्प का खेल खेल में अभ्यास भी करते। हस्त शिल्प के ऐसे कई अभ्यास जैसे मिट्टी के घरौंदे, चक्के, मूर्तीयों को हम खेल खेल में बना डालते बिना किसी प्रशिक्षण के ही । मोती भी चुपचाप बैठ के हमारे इन करतबों का साक्षी बनता क्योंकि यह सब उसके सिलेबस में था नहीं था शायद। पर जब भी हम इन खिलौनों से कोई गतिविधि करते तो वह एक कुशल खिलाड़ी की तरह जरूर भाग लेता।
जब कभी बसंत ऋतु आती तो अचानक ही वहाँ आने वाले पक्षियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो जाता। टें टें करते तोते, रंगबिरुँगी मैंना, बुलबुल, हारिल, कोयल आदि पक्षियों के कलरव से उत्सव का माहौल बन जाता। तब वह पीपल का पेड़ सभी को सम्मोहित कर देता, हम भी प्रकृति की इस विविधता का दर्शन कर मंत्र मुग्ध हो जाते ।
कभी कभी बालपन में हुए आपके अनुभव जीवन मे आपके सोच और चिंतन को भी एक खास दिशा प्रदान करते है। उस पीपल के वृक्ष में तरह तरह के पक्षियों और जीवधारियों का पूरा एक इकोसिस्टम ही विकसित था, पक्षियों के अलावे साँप, बिच्छू, गिलहरी ,छुछुन्दर न जाने कितने जीवों की शरणस्थली था बन गया था वो। ऐसे ही कुछ कारण रहे होंगे कि लोगों ने पीपल के वृक्ष को भगवान वासुदेव से जोड़ दिया होगा ताकि इतने बहुपयोगी वृक्ष को कोई उजाड़ न दे।
बहरहाल , एक दिन की बात है कि मोती को पेड़ से गिरा कोई अंडा मिल गया , वह चटखारे ले ले कर खा रहा था तभी हमलोग वहां आ धमके। मोती हमे वहाँ देखकर सकपका गया, शायद शाकाहारी होने की पोल खुल गई थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह काफी देर तक अपनी नजरें हमसे चुराता रहा। इस घटना के बाद किसी ने उसे कभी मांसाहार करते नहीं देखा ।
गांव में पीपल के नीचे बना ब्रह्म बाबा का मंदिर गांव के लोंगो के लिए श्रद्धा का केंद्र हुआ करता था । लोगों के घर के सभी मांगलिक कार्यक्रम व शादियाँ उनके आशीर्वाद से ही सम्पन्न होते थे। उस समय दूल्हा डोली में जाता था। मंदिर की परिक्रमा के बाद दादा जी का आशिर्वाद लेकर बारात गाँव से निकलती तो रास्ते मे काठ के घोड़े वाला नृत्य देखने में हमे बहुत आनंद आता। उस समय बारात तीसरे दिन विदा होती थी। फिर दूल्हा अपनी दुल्हन को लिये ढोल नगाड़ो के साथ फिर मंदिर और पीपल की परिक्रमा करता।
इस बीच मोती कोई खास प्रतिक्रिया नही करता क्योंकि उसे पता था कि इस कार्यक्रम में सुरक्षा सम्बन्धी कोई खामी नहीं थी, इसे वह नियमित अन्तराल पर होनें वाली एक सामान्य प्रक्रिया समझता था ।
उस समय गाँव मे शादियों में नाच या नाटक-मंडलियों का रिवाज था क्योंकि थियेटर सिर्फ शहरों तक ही सीमित थे। हाँ, मदारी, भालू और बाइस्कोप वाले गर्मियों में जरुर आते थे। साथ ही गाँव मे नाटकों का आयोजन भी वर्ष में एकबार जरूर होता था। ऐसे ही एक बार मेरे घर के आगे एक बड़े टेंट में नाटक का मंचन हो रहा था और गाँव के बच्चे बूढ़े सभी जुटे थे तभी मध्यान्तर से थोड़ा पहले मोती जोर जोर से भौकने लगा। पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन उसके नहीं मानने पर चाचा को शक हुआ औऱ उसके साथ उस जगह पहुँचे तो पाया की मुख्य नहर का एक हिस्सा टूट गया है और पानी सीधे गाँव की तरफ आ रहा है। शोर मचाने पर पूरे गावँ के लोग वहां फौरन पहुंचे और काफी मेहनत के बाद पानी को रोका जा सका।

                 भाग – पांच

हमारे खेतों का कुछ हिस्सा गांव से कुछ दूरी पर पड़ता है ।वहाँ जाने के लिए एक चंवर को जिसमें अक्सर पानी भरा रहता था पार करके जाना होता था। कहते है कि बहुत पहले सरयू नदी की एक धारा उधर से होकर बहा करती थी । बगल में प्राकृतिक रूप से बना एक ताल ( पोखर) भी था जिसमे लगभग हर तरह की मछलियां होती थी। लेकिन हमारा परिवार शाकाहारी था इसलिये हमें कभी उनके स्वाद का चश्का नहीं लगा । हां, जब कभी मछुआरे ताल में जाल डालते तो हम अपने लिए कुछ सुंदर सी मछलियों को उनसे जरूर मांग लेते । कुछ दिन घड़े में रखकर उन्हें अपने कुँए में डाल देते।आते जाते उन्हें देखकर, कुछ दाना खिलाकर प्रफुल्लित होते रहते। हां, कभी मोती उनके ऊपर आक्रमण नही करता था,शायद उनकी गंध उसे पसंद नही आती थी या फिर उन्हें एक निरीह प्राणी समझता था।
उस ताल में कुछ अन्य जीवधारी भी रहते थे जैसे पनडुब्बी, फुटकी, बकुला, जांघिल आदि पक्षी जो अक्सर मछलियों के शिकार के लिये जमे रहते थे। घोंघे ओर केकड़े की चाल और आकारिकी हमें रोमांच से भर देती थी । मोती भी कभी कभी उनसे छेड़छाड़ कर देता था। जबसे बार एक केकड़े ने अपने नुकीले जबड़े में उसका मुंह पकड़ लिया था तबसे वह केकड़ों से दूर ही रहना पसंद करता था।
ताल में बरसात के बाद जब जल-बेरी और कमल के फूल खिलते तो उसकी सुंदरता में जैसे चार चांद लग जाते । तैरकर जलबेर व कमलगट्टे खाने का आनंद वही पता सकता है जिसने उसका स्वाद चखा हो।
कभी कभी चाँदनी रातो में हम लोग चाचा के संरक्षण में छोटी नाव में नौका बिहार करते तो ऐसा लगता कि जैसे गंधर्व लोक धरती पर उतर आया हो। प्रकृति की सुंदरता का यह सहज शुलभ दर्शन बड़े होने पर समय की आपाधापी में शायद गुम सा हो गया।
बहरहाल, उस ताल के उस पार हमारे जो खेत थे उन्हें लोग मंझरिया बोला करते थे। मंझरिया के खेत काफी उर्वर थे क्योंकि उनमें बिना खाद डाले काफी अच्छी फसल होती थी। लेकिन धान की फसल को काटने में बहुत दिक्कत थी , तब वहां कोई बाँध नही बना था। कमर तक पानी को पार करके जाना होता था। हमारे तो पानी कभी कभी गर्दन तक पहुंच जाता था। मोती भी हमारा साथ नहीं छोड़ता, वह तैरकर जाता लेकिन जब मोटी घास के बीच फंस जाता और कू कू करने लगता तो हमे ही उसको घास के जाल से निकालना पड़ता।
मंझरिया का दृश्य बिल्कुल ही प्राकृतिक था। कुछ शीशम के पेड़, जंगली लेकिन चटकीले फूल , एक पुराना कुंआ और एक विशालकाय पीपल का पेड़ जिसे लोग मसान बाबा के नाम से जानते थे। कुछ भी वहां करना होता तो पहले मसान बाबा का नाम लिया जाता , तभी काम सकुशल सम्पन्न होता ऐसा लोगबाग मानते थे। दूसरी बात थी कि वहां बहुत विशाल और जहरीले सांपो का जखीरा भी था। वहाँ डर भी था लेकिन मजा भी आता था क्योंकि हमें वहां भागते हुए खरहे, शाही, गोह आदि जीवो के साक्षात दर्शन हो जाते। शीशम के पत्तों को गमछे में पोटली बना के कुँए से पानी निकाल के पीने की तकनीक का असली उपयोग वही होता पाता था।
जब कभी खेतों की जुताई ट्रैक्टर से होती तो साँपो के बिल टूटते और वे गुस्से से बाहर आते तो पहले से ही घात लगाये बैठा मोती उनपर बिजली की तरह टूट पड़ता । उसे कोबरा, धामिन, करैत ,पनिहा आदि सभी सर्प प्रजातियों के गुण धर्म के बारे में पता था। सांपो को पहले चकमा देकर उनकी पूंछ को छूता तो सांप उस पर पलटवार करता तो वह थोड़ा पीछे हट जाता। फिर मौका देख इनकी गरदन को पकड़ अपने दोनों तरफ दोलन करता तो फटाक फटाक की आवाज दूर तक सुनाई पड़ती फिर वह उनको भागने देता। पुनः पूँछ से पकड़ के उन्हें पटकता । ऐसा वह तब तक करता जब साँप दम नही तोड़ देता। इस तरह उसने अनगिनत साँपो का वध किया होगा । इस रोमांचक युद्ध मे विजयी होकर ,अपना मुंह मिट्टी और घांस में जाकर पोछता ।और हमारे पास आता औऱ बैठकर देर तक हाँफता रहता। हम सभी उसकी बहादुरी की दाद देते और उसे पुचकारते।
मंझरिया में दो वृक्ष ऐसे थे जिनसे बचपने की कई यादें जुड़ी है एक तो था इमली का पेड़ जिस पर फल आते ही बच्चे टूट पड़ते थे , फलों के पकने के इंतजार कौन करता था ? सारे फलों को बच्चे लोग अपने मुंह मे ही पीस डालते।
दूसरे थे सफेद तने वाले दो जुड़वे वृक्ष जिसे हम लोग आक्षी कहते थे । इनमें जब फूल आते तो पुरवा हवा के साथ उनकी मादक सी गन्ध एक किलोमीटर दूर मेरे गाँव तक पहुंच जाती। इसके तनों की खुरदुरी बनावट तथा शाखाओं के क्षैतिज विस्तार के कारण ओला-पाती सरीखे कई खेलों के लिये हमारी पसंदीदा जगह बन गयी थी। घनी और चौड़ी पत्तियां छिपने में काफी सहायक थी।
एकबार,ऐसे ही खेलते हुए मेरा छोटा भाई तेजी से ऊपर की ओर चढ़ रहा था मैं भी उसे छूने के लिये चढ़ना शुरू ही करने वाला था कि मोती ऊपर की ओर मुंह करके जोर जोर से भौंकने लगा । किसी भी खतरे से बेपरवाह हम खेलने में मस्त थे तभी मेरी भाई से एक फुट की दूरी पर फुफकारता साँप मुझे दिखा ।मैं तुरत चिल्लाया – साँप साँप ,ऊपर मंडरा रहे विशालकाय धामिन को देख उसके होश फ़ाख्ता हो गये। उसने आव न देखा ताव ऊँची टहनी से सीधे जमीन पर कूद गया। गनीमत थी कि नीचे मोटी घास होने से उसे ज्यादा चोट नहीं लगी। फिर हम लोग मोती सहित वहां से भागे तो सीधे घर आकर ही रुके । कई दिनों तक उस पेड़ से हमारा रिश्ता टूटा रहा, लेकिन कालांतर में रिश्ता फिर से जुड़ ही गया लेकिन अपेक्षित सावधानी और निरीक्षण के बाद ही चढ़ते थे अब हम लोग।
    ********* क्रमशः ********

 

 

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